हमारी यात्रा

भारतीय वायु सेना का आधिकारिक तौर पर गठन 08 अक्तूबर 1932 को किया गया। इसकी पहली वायुयान फ्लाइट 01 अप्रैल 1933 को अस्तित्व में आई। इसकी नफरी पर आर ए एफ द्वारा प्रशिक्षित छह अफसर और 19 हवाई सिपाही (शाब्दिक तौर पर वायुयोद्धा) थे। इसकी इन्वेंट्री में योजनाबद्ध नं. 1 (थल सेना के सहयोग से) स्क्वॉड्रन के ''ए'' फ्लाइट के मूल में द्रिग रोड स्थित चार वेस्टलैंड वापिती IIए थल सेना बाइप्लेन शामिल थे।
साढ़े चार वर्ष के बाद ''ए'' फ्लाइट ने बागी भिट्‌टानी जनजाति के लड़ाकों के विरुद्ध भारतीय सेना के ऑपरेशनो मे सहायता करने के लिए उत्तरी वजीरिस्तान में मिरानशाह से पहली बार किसी लड़ाई में भाग लिया। इसी दौरान अप्रैल 1936 में पुराने वापिती वायुयानों से एक ''बी'' फ्लाइट गठित की गई। परंतु जून 1938 में जाकर ही ''सी'' फ्लाइट का गठन हो पाया जिससे नं. 1 स्क्वॉड्रन की नफरी पूरी हो पाई। द्वितीय विश्व युद्ध के शुरू होने तक यही एकमात्र भारतीय वायु सेना फॉर्मेशन रही, हालांकि इसके कार्मिकों की संख्या अब तक बढ़कर 16 अफसरों और 662 वायुसैनिकों की हो़ गई थी।
1939 में चैटफील्ड समिति द्वारा भारत की रक्षा से संबंधित समस्याओं का फिर से मूल्यांकन किया गया। इस समिति ने भारत स्थित आर ए एफ (रॉयल एयर फोर्स) स्क्वॉड्रनों में और अधिक उपस्कर शामिल करने का सुझाव तो दिया परंतु प्रमुख बंदरगाहों की सुरक्षा में सहायता करने के लिए स्वैच्छिक आधार पर पांच फ्लाइट गठित करने की योजना के अतिरिक्त और कोई ऐसा सुझाव नहीं दिया जो भारतीय वायु सेना के धीमे विकास में कोई तेजी ला सके। इस आधार पर भारतीय वायु सेना के एक वॉलंटियर रिजर्व को प्राधिकृत किया गया, हालांकि प्रस्तावित तटीय रक्षा फ्लाइट (सी डी एफ) को उपस्करों से लैस करने का काम वायुयानों की उपलब्धता में कमी के कारण गति नहीं पकड़ सका। फिर भी इस प्रकार की पांच फ्लाइटें गठित की गईं, नं. 1 मद्रास में, नं. 2 मुम्बई में, नं. 3 कोलकाता में, नं. 4 कराची में और नं. 5 कोचीन में। नं. 6 फ्लाइट का गठन बाद में विशाखापत्तनम में किया गया। भारतीय वायु सेना और आर ए एफ के नियमित कार्मिकों को शामिल कर बनाई गई इन फ्लाइटों में पूर्व-आर ए एफ वापिती और नं. 1 स्क्वॉड्रन भारतीय वायु सेना के हॉकर हार्ट में कन्वर्जन के बाद इसके द्वारा छोड़े गए वायुयान शामिल किए गए। आखिरकार स्क्वॉड्रन को एक वर्ष के भीतर ही अतिरिक्त पुर्जों की कमी के कारण वापिती वायुयानों पर वापस आना पड़ा और पुराने हो चुके वेस्टलैंड बाइप्लेन की कमी ऑडैक्स की एक फ्लाइट द्वारा पूरी की जाने लगी।
मार्च 1941 के अंत में, नं. 1 और नं. 3 तटीय रक्षा फ्लाइट (सी डी एफ) ने अपने वापिती वायुयान दे दिए जिनकी अगले महीने पेशावर में गठित की जा रही नं. 2 स्क्वॉड्रन के लिए मांग की गई थी, और इनके स्थान पर उन्हें कोलकाता के दक्षिण में स्थित सुंदरबन डेल्टा क्षेत्र की गश्त में प्रयोग किए गए आर्मस्ट्रांग व्हिटवर्थ अटलांटा परिवहन वायुयान जारी किए गए। इसी दौरान नं. 2 सी डी एफ को कॉन्वॉय और तटीय गश्त के लिए मंगाए गए डी एच 89 ड्रैगन रैपिड वायुयान दिए गए, जबकि नं. 5 सी डी एफ की नफरी में डी एच 86 वायुयान शामिल हुआ जिसका प्रयोग इसने केप कैमरिन के पश्चिम क्षेत्र और मालाबार तट पर गश्त के लिए किया।
इसी दौरान भारत में एक प्रशिक्षण ढांचा तैयार करना आवश्यक हो गया और आर ए एफ के उड़ान अनुदेशकों को टाइगर मॉथ वायुयानों पर भारतीय वायु सेना वॉलंटियर रिजर्व कैडेट को अनुदेश देने के लिए उड़ान क्लब की जिम्मेदारी सौंपी गई। ब्रिटिश इंडिया के सात और विभिन्न रजवाड़ों के दो उड़ान क्लबों में 1941 के अंत तक 364 प्रशिक्षणार्थियों को प्रारंभिक उड़ान प्रशिक्षण प्राप्त करना था। अगस्त 1941 में कुछ हद तक आधुनिक सुविधाएं शामिल करने की शुरुआत हुई जब द्रिग रोड में नं. 1 स्क्वॉड्रन में वेस्टलैंड लाईसैन्डर वायुयान शामिल किए जाने लगे और आगामी नवंबर में यूनिट को पेशावर में बॉम्बे वार गिफ्ट फंड से 12 लाईसैन्डर वायुयानों की पूरी स्थापना (एस्टैब्लिशमेंट) प्रदान की गई। सितंबर 1941 में नं. 2 स्क्वॉड्रन वापिती वायुयानों के स्थान पर ऑडैक्स वायुयानों से लैस हो चुकी थी और इसी तरह ऑडैक्स वायुयानों से लैस नं. 3 स्क्वॉड्रन 01 अक्तूबर को पेशावर में गठित की गई।
भारतीय वायु सेना वॉलंटियर रिजर्व (वी आर) को अब नियमित भारतीय वायु सेना में शामिल कर लिया गया, इन फ्लाइट ने प्रारंभ में अपने तटीय रक्षा दर्जे को कायम रखा परंतु दिसंबर में जापान के युद्ध में शामिल होने पर नं. 4 फ्लाइट को चार वापिती और दो ऑडैक्स वायुयानों के साथ मॉलमीन से ऑपरेट करने के लिए बर्मा भेज दिया गया। दुर्भाग्यवश फ्लाइट के छह में से चार वायुयान जापान द्वारा की गई बमबारी में नष्ट हो गए और जनवरी 1942 के अंत में मॉलमीन में नं. 3 फ्लाइट ने नं. 4 का स्थान ले लिया जिसे पूर्व आर ए एफ के चार ब्लेनहीम वायुयानों से पुन: सज्जित किया गया। एक महीने के लिए इन ब्लेनहीम वायुयानों ने लगभग अकेले ही रंगून बंदरगाह पर आने वाले पोतों को हवाई सुरक्षा प्रदान की।
01 फरवरी 1942 को, नं. 1 स्क्वॉड्रन टॉन्गू से सामरिक टोही मिशनो में उड़ान भरते हुए अपने लीसैन्डर वायुयानों के साथ बर्मा पहुंची और इसके बाद लाशियो में एक फ्लाइट तैनात करते हुए मिंगलाडॉन स्थानांतरित हो गई। शीघ्र ही भारतीय वायु सेना कार्मिकों ने अपने लीसैन्डर वायुयानों पर 250 पौंड वजन के दो बम लगाकर बिना एस्कॉर्ट दल के थाइलैंड में माए-हॉन्गसॉन, चेंगमई और चियांगराई स्थित प्रमुख जापानी एयर बेस के विरुद्ध लो लेवल के मिशनो के लिए उड़ान भरना आरंभ किया। परंतु जापानी दलों का आगे बढ़ना लगातार जारी रहा और बर्मा में आखिरी निकासी (इवैक्युएशन) के साथ ही नं. 1 स्क्वॉड्रन के कार्मिकों को भारत भेज दिया गया, जहां जून 1942 में रिसालपुर में यूनिट का हरीकेन IIबी लड़ाकू वायुयानों में कन्वर्जन शुरू हुआ। 
1941 के अंत तक नं. 2 स्क्वॉड्रन भी लीसैन्डर वायुयानों से लैस कर दी गई और कुछ समय के लिए हमला-रोधी अभ्यासों तक सीमित रहने के बाद सितंबर 1942 में भारतीय वायु सेना की प्रमुख यूनिट का अनुसरण करते हुए इसका भी हरीकेन वायुयानों के साथ कन्वर्जन हो गया। नं. 4 स्क्वॉड्रन लीसैन्डर वायुयान ऑपरेट करने वाली भारतीय वायु सेना की तीसरी यूनिट बनी और 16 फरवरी 1942 को इसकी नफरी में चार वायुयान शामिल किए गए। प्रारंभ में इस स्क्वॉड्रन ने वेस्टलैंड वायुयानों को ऑपरेट करना जारी रखा और जून 1943 में इसे भी हरीकेन वायुयानों से लैस कर दिया गया। 
इससे छह महीने पहले नं. 1 और नं. 2 फ्लाइट के कार्मिकों से नं. 6 स्क्वॉड्रन गठित की गई जो कि शुरुआत से ही हरीकेन वायुयानों से लैस थी। मार्च से दिसंबर 1942 के बीच भारत में 10 एयरक्रू स्कूल खोले गए और अंबाला स्थित नं. 1 उड़ान प्रशिक्षण स्कूल को प्रथम हार्वर्ड I और II वायुयान सौंपे गए जिसकी स्थापना भारतीय वायु सेना के पायलटों को साढ़े चार महीने के कोर्स के दौरान बुनियादी और उच्च प्रशिक्षण प्रदान करने के उदेश्य से की गई थी। परंतु वर्ष के अंत तक या भारतीय वायु सेना के गठन से एक दशक बाद और द्वितीय विश्व युद्ध के तीसरे वर्ष तक भारतीय वायु सेना मात्र पांच स्क्वॉड्रन गठित कर पाई। तटीय रक्षा फ्लाइट अब भंग कर दी गई और नं. 3 और नं. 6 फ्लाइट के अधिकतर कार्मिकों को नियमित भारतीय वायु सेना कार्मिकों के साथ मिलाकर फरवरी 1943 के मध्य में नं. 7 स्क्वॉड्रन गठित की गई जो यू एस ए में बने वेन्जिएंस नामक डाइव बमवर्षक वायुयानों से लैस की गई। इसी दौरान तटीय रक्षा फ्लाइट के बाकी बचे कार्मिकों को मिलाकर 01 दिसंबर 1942 को नं. 8 स्क्वॉड्रन गठित की गई। इस स्क्वॉड्रन को 25 जून 1943 को संक्रियात्मक दर्जा प्रदान करने के लिए वेन्जिएंस वायुयानों से लैस किया गया।
वेन्जिएंस में काफी कमियां थीं और इसे पैर जमाने में कई समस्याओं का सामना करना पड़ा जिसके कारण इसे भारतीय वायु सेना की दो स्क्वॉड्रनों से अस्थायी रूप से हटाना आवश्यक हो गया, हालांकि समस्याएं अंततः खत्म तो नहीं हुईं पर काफी हद तक कम अवश्य हो गईं और नं. 8 स्क्वॉड्रन ने 15 दिसंबर 1943 को अपनी पहली संक्रियात्मक वेन्जिएंस सॉर्टी पर जापानी लक्ष्यों के विरुद्ध डबल मूरिंग्स, चटगांव से उड़ान भरी। अपने वेन्जिएंस वायुयानों पर उत्तरी वजीरिस्तान स्थित विद्रोही कबाइलियों के विरुद्ध कुछेक मिशनो पर उड़ान भर चुकी नं. 7 स्क्वॉड्रन ने 12 मार्च 1944 को कुंभीग्राम आ जाने के बाद इसके निकट उदेरबंद स्थित हवाई पट्‌टी से अराकान में ऑपरेशन शुरू किया। ऑपरेशनो के दौरान इन दोनों स्क्वॉड्रनों में वेन्जिएंस III वायुयानों को शामिल किया गया और इन दोनों ही ने उल्लेखनीय सफलता के साथ उड़ान भरी। नं. 7 स्क्वॉड्रन से डाइव बमवर्षक वायुयानों को हटाकर नवंबर 1944 में सामरिक टोह भूमिका के लिए हरीकेन II वायुयानों को शामिल किया गया और इससे पिछले महीने में नं. 8 स्क्वॉड्रन में स्पिटफायर VIII वायुयान शामिल किए गए तथा इसने 3 जनवरी 1945 को कैंगॉ क्षेत्र में ऑपरेशन शुरू किया।
1944 के शुरूआती महीनों में नं. 9 और 10 स्क्वाड्रनों का हरीकेन वायुयानों के साथ गठन किया गया और इस प्रकार वर्ष के अंत तक भारतीय वायु सेना की संक्रियात्मक क्षमता बढ़कर नौ स्क्वॉड्रन हो गई थी जिसमें नं. 1, 2, 3, 4, 6, 7, 9 और 10 हरीकेन वायुयानों से तथा नं. 8 स्क्वॉड्रन स्पिटफायर वायुयानों से लैस थी। दिसंबर 1944 में आरंभ हुए अराकान आक्रमण में हरीकेन वायुयानों से लैस पांच स्क्वाड्रनों ने प्रमुख भूमिका निभाई और दुश्मन संचार क्षेत्र को बाधित करते हुए 3 मई 1945 को रंगून पर कब्जा करने के साथ विजय प्राप्त होने तक जापानी सेनाओं को लगातार परेशानी में डाले रखा। इसी महीने नं. 4 स्क्वॉड्रन स्पिटफायर लड़ाकू वायुयान के एमके VIII संस्करण से लैस होकर भारतीय वायु सेना की दूसरी स्पिटफायर यूनिट बन गई और नं. 9 स्क्वॉड्रन ने भी इसका अनुसरण करते हुए जुलाई तक कन्वर्जन का काम पूरा कर लिया। इस समय तक नं. 10 स्क्वॉड्रन का कन्वर्जन भी शुरू हो चुका था और अधिकांश युद्धकाल में भारतीय वायु सेना की सामरिक ताकत हरीकेन वायुयान अब तेजी से उपयोग से बाहर (फ़ेज़ आउट) किया जाने लगा।
युद्ध के वर्षों में भारतीय वायु सेना के निरंतर विस्तार के क्रम में पूरा जोर सेना के साथ सहयोग और सामरिक टोह पर केन्द्रित था। इसने पुराने हो चले हरीकेन जैसे वायुयानों को उड़ाना जारी रखा जबकि मित्र राष्ट्रों की सेनाओं द्वारा बड़ी संख्या में थंडरबोल्ट और मॉस्क्विटो जैसे वायुयान शामिल किए जा रहे थे और इसके परिणामस्वरूप भारतीय वायु सेना में उपस्करों के मामले में हीनता का भाव पैदा हो गया। फिर भी सबसे कम आकर्षक कार्य सौंपे जाने और उड़ान के क्षेत्र में पुराने उपस्करों से काम लेने के बावजूद भारतीय वायु सेना ने अन्य वायु सेनाओं के समतुल्य स्तर का कार्य-प्रदर्शन करते हुए उच्च कोटि के साहस और कार्यकुशलता का प्रदर्शन किया। इसके कार्मिकों को 22 डिस्टिंग्विश्ड फ्लाइंग क्रॉस (विशिष्ट फ्लाइंग क्रॉस) तथा कई अन्य अलंकरण प्रदान किए गए और इसकी उपलब्धियों के लिए मार्च 1945 में इसे अपने नाम से पहले ''रॉयल'' उपसर्ग लगाने का सम्मान प्रदान किया गया।
द्वितीय विश्व युद्ध से मिली गति की बदौलत इसकी समाप्ति तक रॉयल इंडियन एयर फोर्स की कार्मिक संख्या बढ़कर 28,500 हो गई थी इसमें लगभग 1,600 अफसर शामिल थे। अगस्त 1945 में नं. 4 स्क्वॉड्रन को जापान में ब्रिटिश राष्ट्रमंडल आधिपत्य बलों की एक घटक यूनिट नामित किया गया और अक्तूबर में इसे स्पिटफायर VIII वायुयानों के स्थान पर एमके XIV वायुयानों से लैस किया गया और यह स्क्वॉड्रन 23 अप्रैल 1946 को एचएमएस वेन्जिएंस वायुयानों द्वारा जापान पहुंची। इसी दौरान 1945 के अंत से हरीकेन वायुयानों से लैस आरआईएएफ की शेष लड़ाकू स्क्वाड्रनें कोहट, सामुंगली और रिसालपुर में स्पिटफायर वायुयानों से लैस होने लगीं और 1946 के मध्य तक आरआईएएफ का समस्त लड़ाकू बल स्पिटफायर वायुयानों से लैस हो गया। वर्ष 1946 में आरआईएएफ की पहली परिवहन यूनिट, नं. 12 स्क्वॉड्रन की स्थापना भी हुई जिसका दिसंबर 1945 में कोहट में स्पिटफायर वायुयानों के साथ गठन किया गया और 1946 के अंत में पानागढ़ में इसे सी-47 डकोटा वायुयान प्रदान किए गए। लड़ाकू स्क्वाड्रनों को टेम्पेस्ट II से लैस करने का निर्णय भी लिया गया और 1946 के आरंभ में इस निर्णय पर काम करना शुरू किया गया तथा पहले कोलार स्थित नं. 3 स्क्वॉड्रन और इसके बाद 1946 में नं. 10 स्क्वॉड्रन इन वायुयानों से लैस की जाने वाली स्क्वॉड्रनें बनीं।
इसी दौरान युद्ध के बाद की परिस्थिति में कार्मिकों की संख्या घटकर लगभग आधी रह गई और इसके अफसरों तथा वायुसैनिकों की संख्या लगभग 14,000 तक आ गई परंतु युद्ध के बाद भारत की रक्षा जरूरतों का मूल्यांकन ब्रिटिश प्राधिकारियों ने अपने ही तरीके से किया। अक्तूबर 1946 की स्थिति के अनुसार उन्होंने आर आई ए एफ की मौजूदा दस स्क्वॉड्रनों का विस्तार करके इसे बीस लड़ाकू, बमवर्षक और परिवहन स्क्वाड्रनों वाले एक संतुलित बल के रूप में विकसित करने की योजना बनाई। परंतु तेजी से बदल रही राजनीतिक स्थिति के कारण उत्पन्न घटनाक्रम में भारत के रक्षा क्षेत्र के सरोकार से संबंधित निर्णय स्वतंत्र भारत की नई सरकार के लिए छोड़ दिए गए। जापान से भारत वापस आने पर नं. 4 स्क्वॉड्रन टेम्पेस्ट II वायुयानों पर परिवर्तित हो गई और 1947 के ग्रीष्मकाल में नं. 7 और 8 स्क्वॉड्रन ने अपने स्पिटफायर वायुयानों को छोड़कर और अधिक प्रभावशाली टेम्पेस्ट लड़ाकू वायुयानों को अपनाया। इसी समय नं. 1 और 9 स्क्वाड्रनों ने भी टेम्पेस्ट II वायुयानों को अपना लिया लेकिन 15 अगस्त 1947 को भारत और इसकी सशःस्त्र सेनाओं के विभाजन के साथ ही ये यूनिटें हट गईं और इनके उपस्कर नवगठित रॉयल पाकिस्तान एयर फोर्स को हस्तांतरित कर दिए गए। इस प्रकार विभाजन के समय आर आई ए एफ के प्रमुख घटक टेम्पेस्ट II वायुयानों से लैस नं. 3, 4, 7, 8 और 10 स्क्वॉड्रन, स्पिटफायर वायुयानों से लैस नं. 2 स्क्वॉड्रन, सी - 47 वायुयानों से लैस नं. 12 स्क्वॉड्रन और नं. 1 एयर ऑब्जर्वेश फ्लाइट थीं जिसकी ए ओ पी ऑस्टर 4, 5 और 6 वायुयानों के साथ स्थापना स्वतंत्रता के साथ-साथ हुई। द्रिग रोड में स्पिटफायर वायुयानों की जगह सी-47 वायुयानों से लैस होने की प्रक्रिया में शामिल नं. 6 स्क्वॉड्रन हट गई और इसके परिवहन वायुयान पाकिस्तान को हस्तांतरित कर दिए गए।
देश के विभाजन के परिणामस्वरूप आर आई ए एफ को कई स्थायी बेस और अन्य स्थापनाएं गंवानी पड़ीं और विभाजन से मिले जख्म को भरने का इसे कोई समय भी नहीं मिला तथा इसे तुरंत तत्परता से काम में जुट जाना पड़ा। सीमा पार से जम्मू और कश्मीर में बड़ी संख्या में घुसपैठ कर रहे विद्रोही हमलावरों के खिलाफ आरंभिक भारतीय प्रतिक्रिया के रूप में बिना किसी योजना या टोह के 27 अक्तूबर 1947 को नं. 12 स्क्वॉड्रन ने पालम से प्रथम सिख के योद्धाओं को हवाई मार्ग से ले जाकर श्रीनगर की कठोर और धूल-मिट्‌टी भरी हवाई पट्‌टी पर उतारने का उल्लेखनीय कार्य शुरू किया। 30 अक्तबूर को अंबाला स्थित एडवांस्ड फ्लाइंग स्कूल से स्पिटफायर वायुयानों की पहली टुकड़ी श्रीनगर पहुंची और पट्‌टन से आगे बढ़ने से रोकने के लिए हमलावरों पर गोलाबारी करने में जुट गई। एक सप्ताह के भीतर नं. 7 स्क्वॉड्रन के टेम्पेस्ट वायुयान शेलातांग की लड़ाई में निर्णायक भूमिका में आ गए और यहां घुसपैठियों को आगे बढ़ने से रोक दिया गया।
देश के विभाजन के परिणामस्वरूप आर आई ए एफ को कई स्थायी बेस और अन्य स्थापनाएं गंवानी पड़ीं और विभाजन से मिले जख्म को भरने का इसे कोई समय भी नहीं मिला तथा इसे तुरंत तत्परता से काम में जुट जाना पड़ा। सीमा पार से जम्मू और कश्मीर में बड़ी संख्या में घुसपैठ कर रहे विद्रोही हमलावरों के खिलाफ आरंभिक भारतीय प्रतिक्रिया के रूप में बिना किसी योजना या टोह के 27 अक्तूबर 1947 को नं. 12 स्क्वॉड्रन ने पालम से प्रथम सिख के योद्धाओं को हवाई मार्ग से ले जाकर श्रीनगर की कठोर और धूल-मिट्‌टी भरी हवाई पट्‌टी पर उतारने का उल्लेखनीय कार्य शुरू किया। 30 अक्तबूर को अंबाला स्थित एडवांस्ड फ्लाइंग स्कूल से स्पिटफायर वायुयानों की पहली टुकड़ी श्रीनगर पहुंची और पट्‌टन से आगे बढ़ने से रोकने के लिए हमलावरों पर गोलाबारी करने में जुट गई। एक सप्ताह के भीतर नं. 7 स्क्वॉड्रन के टेम्पेस्ट वायुयान शेलातांग की लड़ाई में निर्णायक भूमिका में आ गए और यहां घुसपैठियों को आगे बढ़ने से रोक दिया गया।
इसी बीच नं. 2 स्क्वॉड्रन स्पिटफायर XVIII वायुयानों से पुनः लैस कर दी गई और नं. 9 स्क्वॉड्रन को इस टाइप पर पुनर्गठित किया गया। जनवरी 1948 में नं. 101 फोटो टोही फ्लाइट का स्पिटफायर पीआर एमके XIX वायुयानों के साथ गठन किया गया और इस यूनिट ने अप्रैल 1950 में पूर्ण स्क्वॉड्रन का दर्जा प्राप्त किया। कश्मीर ऑपरेशन में हुए नुकसान की भरपाई के लिए दिसंबर 1948 में यूके से टेम्पेस्ट II वायुयानों की एक और टुकड़ी की खरीद की गई। इस वर्ष उपस्करों के क्षेत्र में कई परिवर्तन हुए जिनमें से एक का कालक्रम में आर आई ए एफ के गठन पर काफी असर हुआ। आर आई ए एफ ने एक भारी बमवर्षक घटक की स्थापना के इरादे से एच ए एल के साथ ऐसा करार किया कि वह कानपुर स्थित देखभाल और अनुरक्षण यूनिट डिपो के वृहत दायरे में पूर्व यूएसएएफ बमवर्षकों के नष्ट हो चले बल से इस टाइप के लगभग 100 बी-24 लिबरेटर वायुयानों के एक बल का ''पुनर्गठन'' किया जाए।

इस योजना की व्यवहार्यता के बारे में यूएस और ब्रिटिश परामर्शदाताओं की ओर से संदेह व्यक्त किए जाने के बावजूद नवंबर 1948 तक एच ए एल द्वारा पहले छह बी-24 वायुयान तैयार कर लिए गए और 17 नवंबर 1948 को इन भारी बमवर्षक वायुयानों के साथ नं. 5 स्क्वॉड्रन का गठन किया गया। बाद में 1950 के शुरू में पूना में नं. 6 स्क्वॉड्रन भी बी-24 वायुयानों के साथ गठित की गई। जबकि नं. 6 स्क्वॉड्रन टाइप पर बैक-अप प्रशिक्षण मुहैया कराने के लिए स्थापित की जानी थी। टाइगर मॉथ की सहायता के लिए 1948 में प्रेंटिस बेसिक ट्रेनर आरआईएएफ को भेजे गए जिन्हें बाद में जोधपुर, ताम्बरम और अम्बाला में सर्विस के लिए रख लिया गया, लेकिन जहां तक आर आई ए एफ का सवाल है, 04 नवंबर 1948 को तीन वैम्पायर एफ एमके 3 जेट लड़ाकू वायुयानों का आगमन एक ऐतिहासिक घटना साबित हुआ। यह वायु सेना द्वारा आगामी वर्षों में विभिन्न किस्मों के 400 से अधिक वैम्पायर वायुयानों की खरीद के क्रम में पहला कदम था। अगले वर्ष नं. 7 स्क्वॉड्रन द्वारा वैम्पायर एफबीएम के 52 वायुयानों पर संक्रियात्मक दर्जा हासिल करने से आर आई ए एफ को जेट वायुयान ऑपरेट करने वाली एशिया की पहली हवाई शक्ति बनने का गौरव प्राप्त हुआ।
जनवरी 1950 में भारत ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के भीतर एक गणतांत्रिक देश बन गया और भारतीय वायु सेना ने अपने नाम से पहले का ''रॉयल'' उपसर्ग हटा दिया। इस समय इसके पास स्पिटफायर, वैम्पायर और टेम्पेस्ट वायुयानों से लैस छह लड़ाकू स्क्वॉड्रनें कानपुर, पूना, अंबाला और पालम से ऑपरेट कर रही थी, एक बी-24 बमवर्षक स्क्वॉड्रन थी, एक सी-47 डकोटा परिवहन स्क्वॉड्रन थी, एक ए ओ पी फ्लाइट थी, पालम स्थित एक संचार स्क्वॉड्रन थी और एक विकासशील प्रशिक्षण संगठन था। प्रशिक्षण काफी हद तक आर ए एफ द्वारा स्थापित पद्धति के अनुरूप था और अधिकतर अनुदेशक यूके में सीएफएस से स्नातक थे। टाइगर मॉथ और हार्वर्ड वायुयानों से लैस हैदराबाद स्थित नं. 1 उड़ान प्रशिक्षणस्कूल और प्रेंटिस तथा हार्वर्ड वायुयानों से लैस जोधपुर स्थित नं. 2 उड़ान प्रशिक्षण स्कूल के अतिरिक्त बेगमपेट, कोयम्बतूर और जोधपुर में भारतीय वायु सेना कॉलेज थे। डि हैविलैंड वैम्पायर के लाइसेंस के तहत एच ए एल द्वारा वैम्पायर वायुयानों का निर्माण शुरू किया गया और इसे आयात किए गए प्रमुख असेंबली घटकों से एक बैच तैयार करने के बाद आगे 250 और वैम्पायर टी एमके 55 भी तैयार करने थे जिनमें से 10 आयात की गई किट से तैयार किए जाने थे। नं. 7 स्क्वॉड्रन के बाद नं. 2, 3 और 8 स्क्वॉड्रनें भी वैम्पायर वायुयानों से लैस हो गई लेकिन असाधारण रूप से 1951 में पिस्टन इंजन वाले लड़ाकू वायुयानों की आखिरी समाघात यूनिट के गठन का कार्य भी पूरा हो गया जब नं. 14 स्क्वॉड्रन स्पिटफायर एम के XVIII वायुयानों के साथ गठित हुई। पालम स्थित नं. 10 स्क्वॉड्रन को लैस करने के लिए मई 1953 में दो सीट वाले वैम्पायर एनएफ एमके 54 रात्रि लड़ाकू वायुयान हासिल किए गए और इस प्रकार भारतीय वायु सेना को पहली बार रात्रि-अंतर्रोधन (नाइट-इंटरसेप्ट) क्षमता हासिल हुई। इस समय एक बार फिर भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते लगातार बिगड़ते जा रहे थे और भारतीय वायु सेना बड़े स्तर पर किसी भी संघर्ष के लिए कहीं से भी तैयार नहीं दिख रही थी क्योंकि 1947 में विभाजन के समय से इसकी समाघात ताकत में कोई बदलाव नहीं आया था। तदनुसार 1953-57 की अवधि के दौरान महत्वपूर्ण विस्तार की योजना तैयार की गई और सरकार ने समाघात वायुयानों की खरीद के गैर-परम्परागत और वैकल्पिक स्रोतों को ढूंढ़ना शुरू किया।
इस समय फ्रांस से दसॉ ऑरागन लड़ाकू वायुयानों की खरीद से आपूर्ति के स्रोतों का विस्तार करने के फैसले के परिणाम नजर आने लगे। ऑरागन या तूफानी, जैसा कि इन्हें भारतीय वायु सेना में नाम दिया गया, के 100 से अधिक की खेप के पहले चार वायुयान 24 अक्तूबर 1953 को फ्रांस से पालम पहुंचे और इस टाइप से नं. 8, 3 और 4 स्क्वॉड्रनों को इस क्रम में लैस किया गया। समान गालिक स्रोत से प्राप्त मिस्टेयर IVA वायुयानों से 1957 में नं. 3 और 8 स्क्वॉड्रनों को लैस किए जाने के साथ ही अंततः तूफानी वायुयानों को नवगठित नं. 29 और 47 स्क्वाड्रनों के हवाले कर दिया गया।
भारत की अखंडता के प्रति दिख रहे बढ़ते खतरे को देखते हुए समाघात यूनिटों को नए सिरे से लैस करना एक अत्यंत अनिवार्य प्राथमिकता बन गई, परंतु एयरलिफ्ट क्षमता का विस्तार भी जरूरी था। सितंबर 1951 में सी-47 डकोटा वायुयानों पर दूसरी परिवहन स्क्वॉड्रन नं. 11 गठित कर दी गई और सं. रा. अमेरिका से 26 फेयरचाइल्ड सी-119जी पैकेट वायुयानों की खरीद से, जो 1954 के अंत तक भारत आ गए, वायु सेना की संभारिकी सहयोग क्षमता में भी भरपूर वृद्धि हुई। तेजी से एयरलिफ्ट सहायता का दर्जा हासिल करने के लिए नं. 12 स्क्वॉड्रन को सी-119जी वायुयान जारी किए गए, जिसने कुछ वर्षों के लिए उन्हें सी-47 वायुयानों के साथ ऑपरेट किया। पुराने परिवहन वायुयान अंततः नवगठित यूनिट नं. 43 स्क्वॉड्रन के हवाले कर दिए गए। जुलाई 1960 में 29 सी-119जी वायुयानों की दूसरी खेप प्राप्त हुई और मई 1963 मे यूएस आपातकालीन सैन्य सहायता के अंतर्गत और 24 सी-119जी वायुयानों की प्राप्ति से परिवहन बेड़ा और मजबूत हुआ।
अनुरक्षण कमान की स्थापना और सहायक वायु सेना का पुनरुद्धार, ये दोनों घटनाएं 1955 में संपन्न हुईं, सहायक वायु सेना की दो यूनिटें नं. 51 और 52 स्क्वॉड्रनों के रूप में नई दिल्ली और बम्बई में गठित की गईं। इसकी एक तीसरी यूनिट नं. 53 स्क्वॉड्रन अगले वर्ष मद्रास में गठित की गई और नं. 54 (इलाहाबाद), 55 (कलकत्ता), 56 (भुवनेश्वर), और 57 (चंडीगढ़) स्क्वॉड्रनों के रूप में अगले दो वर्ष के दौरान इसकी चार और यूनिटें गठित की गईं। सहायक वायु सेना स्क्वाड्रनों में एच ए एल द्वारा डिजाइन किए गए एचटी-2 प्रशिक्षक वायुयान, जिन्हें आधिकारिक तौर पर 10 जनवरी 1955 को सेवा में शामिल किया गया और हार्वर्ड वायुयान शामिल किए गए जबकि वैम्पायर एफ बी एम के 52 वायुयान 1959 में शामिल किए गए। 
भारतीय वायु सेना में विस्तार और आधुनिकीकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम खास तौर पर वर्ष 1957 में हुआ जब सही अर्थों में लैस करने संबंधी प्रमुख कार्यक्रम की शुरुआत हुई और इससे वायु सेना पूरी तरह से विश्व स्तर पर पहुंची। 110 दसॉ मिस्टेयर IVA की डिलीवरी शुरू हुई और इससे वायु सेना पहली बार पराध्वनिक (ट्रांसोनिक) उड़ान के क्षेत्र में आई और हॉकर हंटर तथा इंग्लिश इलेक्ट्रिक कैनबरा इन दोनों वायुयानों का भारतीय वायु सेना की इन्वेंट्री में समावेश शुरू हुआ। मिस्टेयर वायुयानों के साथ एक नई नं. 1 स्क्वॉड्रन गठित की गई और वैम्पायर वायुयानों से लैस मौजूदा नं. 1 स्क्वॉड्रन का नं. 5 स्क्वॉड्रन के रूप में नया नाम दिया गया। नं. 5 स्क्वॉड्रन कैनबरा बी (I) एमके 58 वायुयानों से लैस की गई और वर्ष के अंत में नं. 7 स्क्वॉड्रन में हंटर एफएमके 56 वायुयानों पर कन्वर्जन शुरू हुआ। शायद यह उचित ही था कि जिस वर्ष भारी मात्रा में आधुनिक हार्डवेयर वायु सेना में शामिल किया गया, उसी वर्ष भारतीय वायु सेना में पिस्टन इंजन वाले पुराने लड़ाकू वायुयानों का दौर भी समाप्त हो गया, जब पिस्टन इंजन वाले लड़ाकू वायुयानों की अंतिम अग्रपंक्ति (फर्स्टलाइन) यूनिट नं. 14 स्क्वॉड्रन ने वैम्पायर वायुयानों से लैस होने की तैयारी करने के लिए अपने स्पिटफायर एमके XVIII वायुयानों में हलवाड़ा तक उड़ान भरी।
अब भारतीय वायु सेना का पूरा जोर अत्यंत अल्प अवधि में इसे 15 स्क्वॉड्रन वाले बल से बढ़ाकर 33 स्क्वॉड्रन वाला बल बनाने पर केन्द्रित एक विस्तार कार्यक्रम को लागू करने पर था, जो कि उपस्करों के क्षेत्र में तेजी से किए जा रहे परिवर्तनों के साथ करना एक कठिन कार्य था। नं. 15, 17, 20, 24, 27 और 45 जैसी कई नई स्क्वॉड्रन अंतरिम उपस्कर के तौर पर वैम्पायर एफबी एमके 52 वायुयानों के साथ गठित की जा रही थी। कैनबरा बी(I) एमके 58 वायुयानों से दो अतिरिक्त स्क्वॉड्रनों नं. 16 और 35 को 1959 तक लैस कर दिया गया। नं. 106 स्क्वॉड्रन को कैनबरा पीआर एमके 57 वायुयानों से लैस किया गया था और 1961 के अंत तक छह स्क्वाड्रनों (नं. 7, 14, 17, 20, 27, 37) को हंटर वायुयानों से लैस किया गया। विकास का यह क्रम केवल समाघात संबंधी घटकों तक सीमित नहीं था इसके साथ ही भारतीय वायु सेना के परिवहन बल के आकार में भी में वृद्धि हुई, अब इसमें छह स्क्वाड्रनें हो चुकी थी जिनमें से तीन सी-47 वायुयानों (नं. 11, 43 और 49), दो सी-119जी वायुयानों (नं. 12 और 19) और एक डीएचसी-3 ऑटर (नं. 41) से लैस थी।
साठ के दशक के शुरूआती वर्षों में भारतीय वायु सेना में नई किस्म के कई और वायुयान शामिल हो गए जिनमें सबसे रोचक संभवतः हल्के लड़ाकू वायुयान फॉलैंड नैट का शामिल किया जाना था। अपनी हैरतअंगेज तेज गति के साथ-साथ नैट की लागत असाधारण रूप से बहुत कम थी। 50 के दशक के मध्य में एच ए एल द्वारा इसके निर्माता के साथ लाइसेंस करारनामा किया गया जिसके बाद मूल निर्माता ने 23 पूरे वायुयान और कल-पुर्जे के 20 सेटों की डिलीवरी दी। भारतीय वायु सेना की पहली यूनिट अर्थात्‌ नं. 23 स्क्वॉड्रन मार्च 1960 में वैम्पायर एफबी एमके 52 वायुयानों के स्थान पर नैट वायुयानों से लैस हो गई। नं. 2 स्क्वॉड्रन 1962 के शुरू में अंबाला में नैट वायुयानों से लैस कर दी गई और जल्द ही नं. 9 स्क्वॉड्रन ने भी इसका अनुसरण किया।
1961-62 में कांगो (अब जायरे) में संयुक्त राष्ट्र के ऑपरेशनों में मदद का कार्य भारतीय वायु सेना के लिए एक असामान्य प्रतिबद्धता थी। कानून और व्यवस्था बहाल करने तथा शांति कायम करने के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा सैन्य दल और समाघात वायुयान दोनों तरह की मदद भेजने की अपील के बाद नं. 5 स्क्वॉड्रन के छह कैनबरा बी (I) 58 वायुयानों ने आगरा से मध्य अफ्रीका के लिए उड़ान भरी। लियोपोल्डविले और कामीना से ऑपरेट करते हुए कैनबरा वायुयानों ने जल्द ही विद्रोही वायु सेना को नष्ट कर डाला, कातांगन स्थित लक्ष्य पर धावा बोला और अक्सर संयुक्त राष्ट्र के जमीनी बलों (ग्राउंड फोर्स) को लंबी दूरी का एकमात्र हवाई सहायता बल मुहैया कराया।
1960 के आखिर में खरीद के स्रोतों का और अधिक महत्वपूर्ण विस्तार हुआ जब भारत-चीन के बीच हिमालय की सीमा पर चीनी बलों के साथ लगातार बढ़ते संघर्ष के परिणामस्वरूप अधिक ऊंचाई के ऑपरेशन के लिए उपयुक्त मध्यम रेंज के हेलिकॉप्टरों की आवश्यकता के साथ-साथ एयरलिफ्ट क्षमता में और वृद्धि करने की आवश्यकता महसूस होने पर सोवियत संघ को आठ एंटोनोव एएन - 12बी वायुयान और 24 आईएल-युशिन 11-14 परिवहन वायुयानों के साथ 10 एमआई-4 हेलिकॉप्टरों की आपूर्ति का मांग-आदेश दिया गया। पहला एएन - 12बी वायुयान 01 मार्च 1961 को भारत पहुंचा और नं. 44 स्क्वॉड्रन इस टाइप पर गठित की गई। इसके बाद पहुंचे 11-14 वायुयानों से एक और नवगठित स्क्वॉड्रन नं. 42 लैस की गई। 1962 के शुरू में आठ और एएन - 12बी वायुयानों का मांग-आदेश दिया गया और भारतीय वायु सेना ने सही अर्थों में आखिरकार भारी एयरलिफ्ट की उल्लेखनीय क्षमता हासिल करनी शुरू कर दी। जुलाई 1963 में हस्ताक्षरित एक समझौते के अंतर्गत 25 और एएन - 12बी वायुयानों के आने से इस प्रक्रिया को भरपूर बल मिला और इस दौरान इस टाइप पर दूसरी स्क्वॉड्रन नं. 25 गठित की गई।
एम आई-4 हेलिकॉप्टरों ने भारतीय वायु सेना की क्षमता पर एएन - 12बी वायुयानों जितना ही व्यापक प्रभाव डाला। इस सोवियत टाइप पर फेज-इन करने से पहले वायु सेना के पास कुछेक छोटे बेल 47जी के पुराने हो चले थोड़े से साइकॉर्स्की एस-55 ही थे और एम आई-4 की डिलीवरी के साथ भारतीय वायु सेना की रोटरक्राफ्ट इन्वेंट्री का व्यापक विस्तार शुरू हुआ। पहले एम आई-4 हेलिकॉप्टरों के साथ नं. 109 हेलिकॉप्टर यूनिट गठित की गई और 1962 के शुरू में 16 और एम आई-4 हेलिकॉप्टरों के मांग-आदेश के बाद पूर्वोत्तर भारत में अन्य हेलिकॉप्टर यूनिटें गठित की गईं। 1963-64 और 1966 में लगातार मांग-आदेश के बाद अंततः एम आई-4 हेलिकॉप्टरों की खरीद की कुल संख्या 120 हो गई।
भारतीय वायु सेना की एयरलिफ्ट क्षमता की परीक्षा की वास्तविक घड़ी 1962 में सामने आई जब भारत-चीन सीमा पर खुला युद्ध शुरू हो गया। 20 अक्तूबर से 20 नवंबर की अवधि के दौरान वायु सेना की परिवहन और हेलिकॉप्टर यूनिटों पर जबरदस्त दबाव था क्योंकि अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित सीमा चौकियों की मदद के लिए लगभग चौबीसों घंटे सैन्यदलों को और रसद पहुंचाने के लिए उड़ान भरते रहना अनिवार्य था। पर्वत-श्रेणी क्षेत्र में स्थित खतरनाक हैलीपैड से ऑपरेट करते समय हेलिकॉप्टरों को चीन के छोटे हथियारों और वायुयान-रोधी गोलाबारी से लगातार बचते हुए अपना काम करना था। इस संघर्ष के दौरान भारतीय वायु सेना ने कई उल्लेखनीय कार्यों को अंजाम दिया जिनमें कराकोरम हिमालय पर्वत-श्रेणी में समुद्र तल से 17,000 फुट (5180 मी.) ऊपर स्थित हवाई पट्‌टी से सी-119जी वायुयानों का परिचालन और एएमएक्स-13 हल्के टैंकों वाले दो सैन्य दलों को एएन-12बी वायुयानों द्वारा हवाई मार्ग से ले जाकर चुशुल, लद्‌दाख में समुद्र तल से 15,000 फुट (4570 मी.) ऊपर स्थित छोटी सी हवाई पट्‌टी पर उतारने का कार्य शामिल था।
भारत-चीन लड़ाई के परिणामस्वरूप घोषित आपातकालीन स्थिति के नतीजे के तौर पर सहायक वायु सेना भंग कर दी गई और इसके कार्मिकों और उपस्करों को नियमित वायु सेना में शामिल कर लिया गया। एक आपातकालीन प्रशिक्षण योजना तैयार की गई जिसमें मद्रास, कानपुर, नई दिल्ली, नागपुर और पटियाला स्थित पांच फ्लाइंग क्लबों की सेवाएं लेने का निर्णय लिया गया। 1964 के अंत तक 1000 से अधिक कैडेटों ने इन क्लबों से प्राइमरी उड़ान अनुदेश प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त 1961 से निष्क्रिय अवस्था में पड़े वैम्पायर एफबीएमके 52 वायुयानों को नवगठित स्क्वॉड्रनों के उपस्कर के तौर पर सेवा में बहाल कर लिया गया।
अगस्त 1962 में एक ऐतिहासिक निर्णय लिया गया जिसने आने वाले दशको में भारतीय वायु सेना की तस्वीर और ताकत में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया। भार सरकार ने भारतीय वायु सेना के लिए कॉम्बैट वायुयानों और मिसाइलों की पहले-पहल आपूर्ति के लिए सोवियत संघ के साथ प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए। सोवियत संघ से 12 मिग-21 लड़ाकू वायुयानों, जो कि गैर-पश्चिमी मूल के भारतीय वायु सेना के पहले कॉम्बैट वायुयान थे, की खरीद और भारत में लड़ाकू वायुयानों के लिए निर्माण सुविधाओं की स्थापना में सोवियत तकनीकी सहायता लेने के बाद सतह से हवा में मार करने वाली एसए-2 (द्विन) मिसाइलों की खरीद की गई। भारतीय वायु सेना को नए उपस्करों से लैस करने और इसका विस्तार करने के साथ-साथ संक्रियात्मक बुनियादी ढांचे में बड़े परिवर्तनों पर भी काम चल रहा था। भारत-चीन संघर्ष से पहले भारतीय वायु सेना की तैयारी पश्चिमी दिशा से आक्रमण के विरुद्ध रक्षा मुहैया कराने तक ही सीमित थी, परन्तु सारी उत्तरी और पूर्वी सीमा की संवेदनशीलता के मूल्यांकन के बाद संक्रियात्मक बुनियादी ढांचे के बारे में व्यापक पुनर्विचार की आवश्यकता हुई।
भारतीय वायु सेना का तेजी से विस्तार हो रहा था और भारत-चीन संघर्ष के समय 28,000 अफसरों और कार्मिकों की इसकी संख्या में 1964 के अंत तक लगभग दो तिहाई बढ़ोत्तरी हो चुकी थी। परंतु 33 स्क्वॉड्रनों वाले बल की जनशक्ति आवश्यकता को पूरा करना अब भी बाकी था, खास तौर पर तब जब इसे 45 स्क्वॉड्रनों वाला बल बनाने की और भी महत्वाकांक्षी विस्तार योजना को सरकार द्वारा अक्तूबर 1962 में मंजूरी दे दी गई। इससे सत्तर के दशक के शुरू में भारतीय वायु सेना कार्मिकों की संख्या बढ़ाकर लगभग 1,00,000 तक लाना अनिवार्य हो गया। 

सोवियत संघ से एएन-12बी वायुयानों के दो बैच और यूएसए से सी-119जी के तीसरे बैच के आगमन के साथ ही भारतीय वायु सेना को कनाडा के डीएचसी-4 कैरिबू प्राप्त होने शुरू हो गए जिनमें से दो वायु सेना को कनाडा सरकार द्वारा भारत-चीन संघर्ष की प्रष्ठभूमि में सहायता के रूप में प्रदान किए गए और इसके अतिरिक्त 16 और कैरीबू के लिए मांग-आदेश दिया गया। सितंबर 1963 में इनकी डिलीवरी शुरू हुई और इनसे नं. 33 स्क्वॉड्रन का गठन किया गया।
अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया था कि भारत जैसे विशाल देश के लिए पूरी तरह से फंक्शनल कमानें अव्यवहार्य थीं और सभी संभावित खतरों में मुकाबले के लिए ऑपरेशनल (संक्रियात्मक) कमानों को भविष्य में क्षेत्रीय आधार पर तैयार करना पड़ेगा। इस प्रकार संक्रियात्मक नियंत्रण के लिए समस्त भारतीय भूभाग को तीन भागों में बांटा गया जो अंततः पश्चिमी, मध्य और पूर्वी वायु कमानों के रूप में सामने आए। परंतु प्रशिक्षण और अनुरक्षण का स्तर समान बनाए रखने के लिए प्रशिक्षण और अनुरक्षण कमानों को फंक्शनल बनाए रखा गया।
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