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भारतीय वायुसेना के मार्शल
मार्शल ऑफ द एयर फोर्स अर्जन सिंह, डी एफ सी 
मार्शल ऑफ द एयर फोर्स अर्जन सिंह डीएफसी भारतीय वायुसेना के इतिहास के एक महानायक हैं और ये अपनी व्यावसायिक सक्षमता, नेतृत्व क्षमता और सामरिक दूरदृष्टि के लिए जाने जाते हैं।
अर्जन सिहं का जन्म 15 अप्रैल 1919 को हुआ था और एक विद्यार्थी के रूप में अपने शुरूआती दिनों से ही ये एक विजेता रहे हैं। ये एक बेहतरीन तैराक थे और एक मील तथा आधे मील की फ्री-स्टाइल तैराकी स्पर्धाओं में इन्होंने अखिल भारतीय रिकॉर्ड कायम किया था। 1938 में 19 वर्ष की आयु में अर्जन सिंह का चयन आरएएफ क्रैनवेल में प्रशिक्षण के लिए किया गया था। भारतीय कैडेटों के अपने बैच में इन्होंने कोर्स में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। रॉयल एयर फोर्स कॉलेज क्रैनवेल में अपने प्रशिक्षण के दौरान ये तैराकी, ऐथलेटिक्स और हॉकी की टीम के उप-कप्तान थे।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा अभियान में उत्कृष्ट नेतृत्व क्षमता, शानदार कौशल और साहस का प्रदर्शन करने के लिए इन्हें 1944 में विशिष्ट फ्लाइंग क्रॉस (डीएफसी) प्रदान किया गया था। 1945 के शुरू में विंग कमांडर अर्जन सिंह का चयन  यू के में ब्रैकनेल स्थित आरएएफ स्टाफ कॉलेज में कोर्स के लिए किया गया था।
15 अगस्त 1947 को इन्हें लाल किला के ऊपर भारतीय वायुसेना के सौ से अधिक वायुयानों की सलामी उड़ान (फ्लाई पास्ट) की अगुवाई करने का विलक्षण गौरव प्राप्त हुआ और इसी दिन इन्होंने ग्रुप कैप्टन रैंक में वायुसेना स्टेशन, अंबाला की कमान संभाली। उड़ान और प्रशिक्षण के काम में उच्च स्तर कायम करने के अलावा इन्होंने पूरी निष्पक्षता से प्रशासन को सुव्यवस्थित किया और देश तथा वायुसेना के विघटन और विभाजन एवं अभूतपूर्व स्तर के सांप्रदायिक दंगों के तिहरे झटके से उबरने में सक्षम बनाया।
1949 में एयर कमोडोर अर्जन सिंह ने वायु अफसर कमांडिंग की हैसियत से ऑपरेशनल कमान की कमान संभाली जो बाद में पश्चिम वायु कमान के नाम से जाना गया। अर्जन सिंह को 1949-1952 तक और दोबारा 1957-1961 तक ऑपरेशनल कमान के एओसी के रूप में सबसे लंबे कार्यकाल का गौरव प्राप्त है। एयर वाइस मार्शल के पद पर पदोन्नत किए जाने के बाद ये ऑपरेशनल कमान के एओसी-इन-सी रहे। 1962 के युद्ध के आखिरी दिनों में इन्हें डीसीएएस के पद पर नियुक्त किया गया और 1963 में ये वीसीएएस बने। ये भावासे, आरएएफ और आरएएएफ के बीच आयोजित किए गए संयुक्त वायु प्रशिक्षण अभ्यास ‘शिक्षा’ के मुख्य कमांडर थे और इस प्रकार भावासे के लिए नई रेडार प्रणालियों के अर्जन और उन्नत गनरी कोर्स के लिए यूएसए में भावासे अफसरों के प्रशिक्षण की नींव पड़ी। जामनगर में आयुध प्रशिक्षण विंग और आगे चलकर 1967 में वायुसेना अकादमी की योजना बनाने और स्थापना करने में भी इनकी प्रमुख भूमिका थी।
वायुसेनाध्यक्ष के तौर पर एयर मार्शल अर्जन सिंह ने 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में भारतीय वायुसेना का नेतृत्व किया जिसमें भावासे छंब में पाकिस्तान के सशस्त्र प्रयास को नाकाम करने में सफल रही, इसने पीएएफ के ऊपर हवाई श्रेष्ठता हासिल की और भारतीय सेना को सामरिक जीत प्राप्त करने में मदद की।
अर्जन सिंह को 1965 के युद्ध में भारतीय वायुसेना का नेतृत्व करने के लिए पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। बाद में इस युद्ध में वायुसेना के योगदान के सम्मान में वायुसेनाध्यक्ष के रैंक को अपग्रेड करके एयर चीफ मार्शल कर दिया गया और अर्जन सिंह भारतीय वायुसेना के प्रथम एयर चीफ मार्शल बने। दो रैंकों में वायुसेनाध्यक्ष के रूप में पांच वर्षों का कार्यकाल पूरा करने के बाद अर्जन सिंह 16 जुलाई 1969 को सेवानिवृत्त हो गए।
अपने करियर में अर्जन सिंह ने द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व के समय के बाईप्लेन से लेकर सुपरसोनिक मिग-21 तक अलग-अलग किस्म के 60 से अधिक वायुयान उड़ाए। इन्होंने मिग-21 पर वायुसेनाध्यक्ष की हैसियत से अपनी प्रथम एकल उड़ान भरी और अग्रवर्ती स्क्वॉड्रनों तथा यूनिटों का दौरा करते हुए और उनके साथ उड़ान भरते हुए भावासे में अपने कार्यकाल के आखिर तक एक फ्लायर बने रहे।
1971 में अर्जन सिंह को स्विटजरलैंड में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया। तीन वर्ष बाद इन्हें कीनिया में देश का उच्चायुक्त नियुक्त किया गया। इन्होंने 1978 में अल्पसंख्यक आयोग के एक सदस्य के तौर पर और बाद में अत्यंत प्रतिष्ठित संस्थान, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, नई दिल्ली के अध्यक्ष के तौर पर 1983 तक अपनी उत्कृष्ट सेवा प्रदान की। 1989 में इन्हें दिल्ली का लेफ्टिनेंट गवर्नर (उप-राज्यपाल) नियुक्त किया गया।
अर्जन सिंह अपने देशवासियों और भावासे अफसरों के लिए प्रेरणास्रोत रहे हैं। सफलता के लिए इनका सरल सूत्र इन्हीं के कुछ शब्दों से समझा जा सकता है, 
“सबसे पहले आपको अपने पेशे में हर बात के लिए पूरी तरह तैयार होना चाहिए; दूसरे, सौंपे गए काम को हरेक की संतुष्टि के स्तर कर पूरा करें;  तीसरे, आपको अपने अधीनस्थों पर पूरा भरोसा होना चाहिए और चौथे, आपके प्रयास हमेशा ईमानदार और सच्चे होने चाहिए।” 1965 के युद्ध के दौरान भारत के रक्षा मंत्री रहे वाई वी चव्हाण ने इन्हें एक बेहतरीन इंसान, काफी कार्यक्षम और अडिग, चमक-दमक से दूर किंतु एक अत्यंत समर्थ लीडर बताया।
भारतीय वायुसेना से सेवानिवृत्त होने के बाद अर्जन सिंह सक्रिय बने रहे और वायुसेना के भूतपूर्व योद्धाओं के कल्याण के लिए विभिन्न कार्यक्रमों में अपनी सहायता प्रदान करते रहे। इस उद्देश्य के लिए इन्होंने अपनी निजी संपत्ति से बीस मिलियन (दो करोड़) रुपये दान करते हुए 2004 में एक न्यास (ट्रस्ट) की स्थापना की। 
17 अप्रैल 2007 को भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अर्जन सिंह को एक पत्र लिख कर ‘मार्शल ऑफ द एयर फोर्स’ से सम्मानित किया और इसमें उल्लेख किया कि देश उन्हें हमेशा प्रेरणा और ज्ञान के एक स्रोत तथा भारत के सशस्त्र बलों की एक शक्ति के रूप में देखता है।
16 सितंबर 2017 को मार्शल ऑफ द एयर फोर्स अर्जन सिंह का निधन हो गया। इनका शानदार व्यक्तित्व, व्यावसायिक सक्षमता, भारतीय वायुसेना और देश के प्रति अपनी सच्ची सेवा और कर्तव्यनिष्ठा वाकई इन्हें एक लीडर और भारतीय वायुसेना की एक महान हस्ती के रूप में एक अलग ही दर्जा प्रदान करती है।
विंग कमांडर केके ‘जंबो’ मजुमदार डीएफसी 
जन्म: 06 सितंबर 1913  निधन: 17 फरवरी 1945
भारतीय वायुसेना को एक ऐसा अफसर पेश करने का गौरव प्राप्त है जिसका नाम द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक सभी मित्र देशों के बलों के सर्वश्रेष्ठ पायलटों में शुमार किया गया। विंग कमांडर केके ‘जंबो’ मजुमदार डीएफसी का जन्म 06 सितंबर 1913 को कोलकाता में हुआ था। दिसंबर 1933 में इन्होंने रॉयल फ्लाइंग क्लब से अपनी शिक्षा पूरी की और वायुसेना में इनके बेहतरीन करियर का आगाज़ हुआ। नवंबर 1934 में पायलट अफसर केके मजुमदार को भारतीय वायुसेना की दृघ रोड, कराची स्थित नं. 1 स्क्वॉड्रन में पदस्थापित किया गया जहां इन्होंने ठोस नेतृत्व और जांबाज कार्य-निष्पादन का प्रदर्शन किया। इन्हें विशिष्ट फ्लाइंग क्रॉस (डीएफसी) से सम्मानित किया गया और इस प्रकार यह सम्मान प्राप्त करने वाले ये भारतीय वायुसेना के प्रथम पायलट बने। 17 फरवरी 1945 को एक एयर शो के दौरान मुश्किल कलाबाजी को अंजाम देते हुए लाहौर के निकट वाल्टन में एक दुर्घटना में इनका निधन हो गया।
एयर कमोडोर मेहर सिंह
जन्म: 20 मार्च 1915   निधन: 11 मार्च 1952
एयर कमोडोर मेहर सिंह का जन्म 20 मार्च 1915 को ल्यालपुर जिले में हुआ था। मेहर सिंह काफी कम उम्र से ही उड़ान के विचार से काफी प्रभावित थे, जिससे ये 1934 में रॉयल एयर फोर्स कॉलेज क्रैनवेल, इंग्लैंड से जुड़ने के लिए प्रेरित हुए और जल्द ही अपने उड़ान कौशल से ही इन्होंने यहां अपने साथी वायुसैनिकों से सम्मान अर्जित कर लिया। बाबा मेहर सिंह अपने अधीनस्थों के बीच एक सख्त अनुशासन प्रेमी की छवि रखते थे किंतु ये काफी प्रेम और परवाह के साथ उनका ध्यान भी रखते थे। प्रभावशाली नेतृत्व और व्यक्तिगत बहादुरी के लिए 29 वर्ष की आयु में एक स्क्वॉड्रन के कमांडर के पद पर रहते हुए इन्हें विशिष्ट सर्विस ऑर्डर (डीएसओ) से सम्मनित किया गया। इनकी कई उपलब्धियों में 1948 में श्रीनगर में एक डकोटा वायुयान में भारतीय सेना की पहली सैन्य टुकड़ी को अपने नेतृत्व में ले जाने का मिशन सबसे यादगार है। बाबा मेहर सिंह 1948 में भारतीय वायुसेना से सेवानिवृत्त हो गए। 11 मार्च 1952 को एक हवाई दुर्घटना में इनका असामयिक निधन हो गया।

एयर मार्शल सुब्रतो मुखर्जी
जन्म: 05 मार्च 1911      निधन: 08 नवंबर 1960
सुब्रतो मुखर्जी आपस में काफी जुड़े और प्रसिद्ध एक बंगाली परिवार की सबसे छोटी संतान थे। 18 वर्ष की आयु में ये रॉयल एयर फोर्स कॉलेज क्रैनवेल में दो वर्षों के लिए उड़ान प्रशिक्षण में भाग लेने के लिए चुने गए पहले छह भारतीय युवाओं में से एक थे। 08 अक्तूबर 1932 को कमीशन प्रदान किए गए छह भारतीय कैडेट में एक ये भी थे। ये एक फ्लाइट, एक स्क्वॉड्रन, एक स्टेशन और आखिर में स्वयं वायुसेना की कमान संभालने वाले पहले भारतीय बने। इन्होंने 1942 में एनडब्ल्यूएफपी (उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत) ऑपरेशन में भाग लिया और इनका ‘विशेष नामोल्लेख’ (मेंशन इन डिस्पैचेज) किया गया। जून 1945 में इन्हें ‘ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर’ (मिलिटरी डिविजन) से सम्मानित किया गया। इन्होंने 1954 में भारतीय वायुसेना के कमांडर-इन-चीफ का पदभार संभाला। 1960 में इनका निधन हो गया।
फ्लाइंग अफसर निर्मलजीत सिंह सेखों
जन्म: 17 जुलाई 1943      निधन: 14 दिसंबर 1971
फ्लाइंग अफसर निर्मलजीत सिंह सेखों का जन्म 17 जुलाई 1943 को पंजाब के लुधियाना जिले के रूड़का गाँव में हुआ था । ये ऑनरेरी फ्लाइट लेफ्टिनेंट तरलोचन सिंह सेखों के पुत्र थे। इन्हें 04 जून 1967 को भारतीय वायुसेना की उड़ान शाखा में कमीशन प्रदान किया गया था। इन्हें 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में एक पाकिस्तानी हवाई हमले के दौरान सेबर वायुयानों के खिलाफ एक नैट वायुयान में उड़ान भरते हुए अकेले श्रीनगर एयर बेस की रक्षा करने के सम्मान में भारत का सर्वोच्च सैन्य अलंकरण परमवीर चक्र (मरणोपरांत) प्रदान किया गया।

ए वी एम हरजिंदर सिंह
जन्म: 04 फरवरी 1909  निधन: 06 सितंबर 1971
हरजिंदर सिंह एक सैनिक की रैंक से नीचे एक हवाई सिपाही के रूप में भारतीय वायुसेना में शामिल हुए। इन्हें 03 सितंबर 1942 को रॉयल एयर फोर्स में कमीशन प्रदान किया गया। इनकी कई पहल में 1958 के शुरू में भावासे स्टेशन कानपुर में एक वायुयान के निर्माण का काम शामिल है। ये एक बेजोड़ इंजीनियर थे और अपने समय से आगे की सोच रखते थे। ये एयर वाइस मार्शल की रैंक तक पहुँचे और कानपुर स्थित प्रतिष्ठित अनुरक्षण कमान के प्रथम कमांडर-इन-चीफ बने। 06 सितंबर 1971 को इनका असामयिक निधन हो गया।
एयर चीफ मार्शल पीसी लाल

एयर चीफ मार्शल प्रताप चंद्र लाल का जन्म दिसंबर 1916 में इलाहाबाद में वकीलों के एक परिवार में हुआ था। विमानन में इन्हें युवावस्था से ही रूचि थी और जनवरी 1934 में ये 17 वर्ष की आयु में अमेच्योर पायलट लाइसेंस अर्जित करने वाले सबसे युवा भारतीय बने। 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ने के परिणामस्वरूप रॉयल इंडियन एयर फोर्स का विस्तार किया जाने लगा और पायलेट लाइसेंस धारक सभी युवाओं को इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया। इस प्रकार भारतीय वायुसेना में इनकी शानदार यात्रा का आगाज़ हुआ। 1939 से शुरू करते हुए 1973 में अपनी सेवानिवृत्ति तक इन्होंने भारतीय वायुसेना को अपनी सेवाएं प्रदान की। अपने गौरवशाली करियर में इन्होंने नं. 7 स्क्वॉड्रन (बर्मा अभियान में) की कमान संभाली, पश्चिम वायु कमान मुख्यालय के एओसी-इन-सी रहे, एचएएल के प्रबंध निदेशक और अध्यक्ष रहे, सह वायुसेनाध्यक्ष रहे और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान वायुसेनाध्यक्ष रहे। इन्हें विशिष्ट फ्लाइंग क्रॉस (डीएफसी), पद्म भूषण और पदम विभूषण से सम्मानित किया गया। भारतीय वायुसेना से अपनी सेवानिवृत्ति के बाद ये 1980 कर इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया के संयुक्त अध्यक्ष रहे। एयर चीफ मार्शल प्रताप चंद्र लाल का 1982 में निधन हो गया।
एयर चीफ मार्शल ओम प्रकाश मेहरा

एयर चीफ मार्शल ओम प्रकाश मेहरा का जन्म 19 जनवरी 1919 को लाहौर में हुआ था। इन्होंने 1933 में सेंट्रल मॉडल स्कूल से स्कूल की पढ़ाई पूरी की और गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी, लाहौर में आगे की पढ़ाई  के लिए पहुँचे। नॉर्दर्न इंडिया फ्लाइंग क्लब, वाल्टन में थोड़े समय के लिए टाइगर मॉथ वायुयान उड़ाने के बाद ये 30 नवंबर 1940 को पायलट अफसर के तौर पर आरआईएएफ में शामिल हुए। भारतीय  वायुसेना में अपने कार्यकाल के दौरान इन्होंने प्रतिष्ठित नं. 1 स्क्वॉड्रन की कमान संभाली और अंबाला स्थित प्रारंभिक उड़ान प्रशिक्षण स्कूल के कमांडेंट के तौर पर सेवा की। 1963 में इन्होंने अनुरक्षण कमान के एओसी-इन-सी का पदभार संभाला, जिस पर इन्होंने 1965 के युद्ध के दौरान सेवा की। इसके बाद इन्होंने उप वायुसेनाध्यक्ष का पदभार संभाला और फिर हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के अध्यक्ष बने। 15 जनवरी 1973 को एयर चीफ मार्शल पीसी लाल से कार्यभार ग्रहण करते हुए ये वायुसेनाध्यक्ष बने। इन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। सेवानिवृत्ति के बाद ये 1980 में महाराष्ट्र और बाद में 1982 में राजस्थान के राज्यपाल के पद पर रहे।
एयर चीफ मार्शल दिलबाग सिंह

एयर चीफ मार्शल दिलबाग सिंह का जन्म 10 मार्च 1926 को पंजाब के गुरदासपुर जिले में हुआ था। इन्हें 1944 में आरआईएएफ में एक पायलट के रूप में कमीशन प्रदान किया गया था। इनके ऑपरेशनल उड़ान करियर का विस्तार स्पिटफायर से लेकर भारत में मिग-21 स्क्वॉड्रन के गठन तक था । इसके पहले इन्होंने नई दिल्ली में भारत का पहला आधिकारिक “सुपरसोनिक बैंग” अंजाम दिया था, जब एक सार्वजनिक प्रदर्शन में मिस्टेयर IV-A ने करतब दिखाए थे। इन्होंने स्पिटफायर XVIII उड़ाते हुए 2 स्क्वॉड्रन और मिस्टेयर IV-A उड़ाते हुए 1 स्क्वॉड्रन की तथा वायुसेना बेस लोहेगांव की भी कमान संभाली। इन्होंने पश्चिम वायु कमान के एओसी-इन-सी का पदभार संभाला और 1981 से 1984 तक वायुसेनाध्यक्ष के पद को सुशोभित किया। सेवानिवृत्ति के बाद ये 1985 से 1987 तक ब्राजील में भारत के राजदूत रहे। फरवरी 2001 में इनका निधन हो गया। 
एयर चीफ मार्शल इदरीस हसन लतीफ़


एयर चीफ मार्शल इदरीस हसन लतीफ़ का जन्म 09 जून 1923 को हैदराबाद में हुआ था। इन्होंने प्रतिष्ठित निजाम कॉलेज, हैदराबाद से शिक्षा प्राप्त की। इन्हें 1942 में आरआईएएफ में कमीशन प्रदान किया गया था। इन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अराकान मोर्चे पर बर्मा अभियान में भाग लिया। इन्होंने वॉशिंगटन डीसी में भारतीय दूतावास में वायु अताशे के रूप में सेवा प्रदान की और कनाडा में भारतीय उच्चायुक्त के कार्यालय में वायु अताशे की दोहरी जिम्मेवारी भी संभाली। भारतीय वायुसेना में अपने कार्यकाल में इन्होंने सहायक वायुसेनाध्यक्ष (योजना), एओए, मध्य वायु कमान और अनुरक्षण कमान में एओसी-इन-सी, सह वायुसेनाध्यक्ष की विभिन्न नियुक्तियों का कार्यभार संभाला और 1978 में वायुसेनाध्यक्ष नियुक्त किए गए। भारतीय वायुसेना से सेवानिवृत्ति के बाद इन्होंने महाराष्ट्र के राज्यपाल और फ्रांस में भारत के राजदूत के रूप में सेवा प्रदान की। 27 जून 2008 को इनका निधन हो गया।
एयर चीफ मार्शल लक्ष्मण माधव कात्रे


एयर चीफ मार्शल लक्ष्मण माधव कात्रे का जन्म 26 जनवरी 1927 को मद्रास में हुआ था। इन्हें 09 अप्रैल 1945 को कमीशन प्रदान किया गया था और भारतीय वायुसेना की 1 स्क्वॉड्रन में एक पायलट अफसर के रूप में इनके शानदान करियर का आगाज़ हुआ। आगे चलकर इन्होंने 17 स्क्वॉड्रन और 7 स्क्वॉड्रन की कमान संभाली। इन्होंने वायुसेना अकादमी, डंडिगल में कमान्डेंट के तौर पर सेवा प्रदान की जहां इन्होंने ग्राउंड ड्यूटी शाखाओं के प्रशिक्षण को सुकर बनाने के लिए सुविधाओं का विस्तार किया और जेट वायुयान पर उन्नत प्रशिक्षण के लिए उड़ान गतिविधियों को नया स्वरूप दिया। इन्होंने पूर्वी वायु कमान में और बाद में पश्चिम वायु कमान में एओसी-इन-सी के तौर पर सेवा प्रदान की। 04 सितंबर 1984 को इन्होंने वायुसेनाध्यक्ष का पदभार संभाला। इस पद की जिम्मेदारी अंजाम देते हुए ही 01 जुलाई 1985 को इनका असामयिक निधन हो गया।

विंग कमांडर राकेश शर्मा


विंग कमांडर राकेश शर्मा का जन्म 13 जनवरी 1949 को पंजाब के पटियाला में हुआ था। इन्होंने सेंट जॉर्ज्स ग्रामर स्कूल, आबिद रोड, हैदराबाद से स्कूली शिक्षा प्राप्त की। इन्हें 1970 में भारतीय वायुसेना में एक पायलट अफसर के रूप में कमीशन प्रदान किया गया था। विंग कमांडर राकेश शर्मा 1984 में स्क्वॉड्रन लीडर के पद पर रहते हुए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और सोवियत इंटरकॉस्मोस स्पेस प्रोग्राम के बीच एक संयुक्त अंतरिक्ष कार्यक्रम के सदस्य के रूप में एक ऐतिहासिक मिशन का हिस्सा बने। इन्होंने साल्यूत 7 स्पेस स्टेशन पर अंतरिक्ष में 8 दिन बिताए। इसमें 35 वर्षीय राकेश शर्मा को 03 अप्रैल 1984 को सोयूज टी-11 पर दो सोवियत अंतरिक्ष यात्रियों के साथ भेजा गया था। अंतरिक्ष से अपनी वापसी पर इन्हें ‘हीरो ऑफ सोवियत यूनियन’ के सम्मान से नवाजा गया। भारत सरकार ने इन्हें शांतिकाल के अपने सर्वोच्च पुरस्कार ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया।

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